भारतीय सांस्कृतिक कोश

“अ” से बोले जाने वाले सांस्कृतिक शब्दों की परिभाषा

अंकोरवाट

कंबोडिया या कंपूचिया का एक नगर जो भव्य और कलात्मक विष्णु मंदिर के कारण प्रसिद्ध है। इस मंदिर का 213 फीट ऊंचा शिविर दूर से ही दर्शन पियों को आकृष्ट करता है। इसका निर्माण कंबुज के राजा सूर्य वर्मा (1049-66६.) ने कराया था। इस क्षेत्र में हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति का प्रवेश ईसा को प्रथम शताब्दी से आरंभ हो चुका था। दक्षिण भारत के पल्लव राजवंश के लोग इसके प्रथम वाहक थे । बौद्धों का प्रवेश बाद में हुआ। ग्यारहवीं शताब्दी में बने स्थापत्य और मूर्तिकला के अनुपम उदाहरण इस मंदिर से प्रकट होता है कि इस्लाम के प्रवेश से पूर्व इस क्षेत्र में वैष्णव धर्म का पूरा प्रभाव था। यह मंदिर तीन मंजिल का है और इसकी रक्षा के लिए चारों ओर दीवार और 700 फुट चौड़ी खाई बनाई गई है।

अंगिरस या अंगिरा

एक प्रसिद्ध वैदिक ऋषि, आयुर्वेद के प्रारंभकर्ता होने के कारण अथर्व भी कह देते हैं। अथर्ववेद का प्राचीन नाम ‘अथर्वानिरस’ है। इनकी गणना सप्त ऋषियों और दस प्रजातियों में होती है। देवताओं के पुरोहित और नक्षत्रों में बृहस्पति यही है। एक मत के अनुसार इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से हुई है। अन्यत्र इन्हें अग्नि की पुत्री आग्नेयी के गर्भ से उत्पन्न माना जाता है। ये दस पुत्रों और सप्त कन्याओं के पिता थे। भागवत के अनुसार उन्होंने रथात र नाम के निःसंतान क्षत्रिय की पत्नी से ब्राह्मणों पम पुत्र उत्पन्न किए और महाभारत में इनकी बनाई अंगिरसी स्मृति का और याज्ञवल्क्य स्मृति में अंगिरस कृत धर्म शास्त्र का उल्लेख मिलता है कालांतर में अंगिरा नाम के एक प्रख्यात ज्योतिर्विद और धर्मशास्त्रकार भी हुए है। कुछ विद्वानों का मत है कि इस नाम के एक नहीं अनेक प्रसिद्ध व्यक्ति हुए हैं।

अंधक

1. पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार कश्यप और दिति का पुत्र एक दैत्य, जिसके हजार सिर, दो हजार भुजाएं, दो हजार आंखें और दो हजार पैर थे। अि सहते हुए भी घमंड में पूरा, अंधों को तरह चलने के कारण अंधक कहलाया। स्वर्ग से पारिजात वृक्ष लगाते समय शिवजी के हाथों मारा गया। उसने शिव के मस्तक पर गदा से प्रहार किया जिसमे पांच भैरव उत्पन्न हुए और उन्होंने इसका काम तमाम किया।
2. सुधारित नामक यादव का पुत्र जो यादवों को अंधक शाखा का पूर्वज और प्रतिष्ठाता माना जाता है। अधिक से यादवों की अंधकों को शाखा और इसके भाई वृष्णि से वृष्णियों की शाखा चली। इन दोनों गणराज्यों के मिल जाने से बाद में ‘अंधक-वृष्णि संघ स्थापित हुआ।

अकादमी

ऐसी संस्था जो विज्ञान, साहित्य, दर्शन, इतिहास, चिकित्सा अथवा ललित कला के किसी अंग विशेष की समृद्धि के लिए गठित की गई हो। कुछ समय पहले तक ये अकादमियां कुछ विशिष्ट व्यक्तियों की पहुंच तक ही सीमित थी। परंतु अब ये जनजीवन के और जनसाधारण की अभिरुचि के अधिकाधिक निकट आने लगी हैं। हमारे देश की ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और साहित्य अकादमी इसी प्रकार की संस्थाएं है।
‘अकादमी’ शब्द की उत्पत्ति बहुत रोचक है। प्राचीन यूनान में एथेंस नगर के एक व्यक्ति अकादमी के निजी उद्यान का नाम ‘अकादमी’ था। आगे चल कर यह निजी उद्यान न रहकर व्यायाम, चिकित्सा आदि का केंद्र बन गया। अफलातून ( प्लेटो) ने अपना पहला विद्यापीठ यहीं पर स्थापित किया और कालांतर में उस विद्यापीठ का नाम ही ‘अकादमी’ पड़ गया। वहां जिस प्रकार की गतिविधियों का विकास हुआ, उसके कारण ऐसे उद्देश्यों के लिए बनी संस्थाएं सर्वत्र अकादमी कहलाने लगीं।

अकाली

सिखों का प्रमुख संगठन । सिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक देव ने परमात्मा को आराधना अकाल पुरुष के रूप में की। अकाल का अर्थ है-भूत, भविष्य तथा वर्तमान से परे गुरुयों ने अकाली के लिए जीवन निर्वाह का एक बलिदान पूर्ण दर्शन बनाया जिसके कारण वे अन्य साथियों से पुक दिखाई देने लगे 1699. में गुरु गोविंदसिंह ने बालसा पंथ की स्थापना की, जिसके अनुवादी ही थे। औरंगजेब के अत्याचारों का अकालियों ने खानसा सेना के रूप में सामना किया। तभी से इनके लिए मीना वस्त्र धारण करना और पंचककार प कच्छा, के, कृपाण, कड़ा) अनिवार्य कर दिया गया। महाराजा रणजीत सिंह के समय यह सेना अपने चरमोत्कर्ष पर थी। अंग्रेजों के समय में बहुत से गुरुद्वारों और धर्मशालाओं आदि पर ऐसे लोगों का अधिकार हो गया था जो और जीवन के आदर्श पर परे नहीं उतरते मे अतः ऐसे लोगों को अपदस्थ करने के लिए 1920 में अचानक नवयुवकों ने एक नया संगठन बनाया। आरंभ में अंग्रेजों ने मठाधीशों का पक्ष लिया। पर अंत में अकाली अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफल रहे। 1923 ई. में सभी गुरुद्वारे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के अधीन आ गए। इस समिति का प्रति पांचवें वर्ष निर्वाचन होता है।
सैनिक को हैसियत से अकाली निहंग (अनियंत्रित) कहलाते हैं। नीली धारी दार पोशाक, कलाई में कहा, ऊँची नीची पहाड़ी में तेज धार वाला लोहे का चित्र कटार छु तथा लोहे की जंजीर अकालियों का माना है। ये मांस-मदिरा का सेवन नहीं करते तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। अमृतसर के अकाल तख्त से इनके धार्मिक कृत्यों का नियमन होता है।
अकूती पवित्रता और हरिभक्त के रूप में प्रसिद्ध अकूत स्वायंभुव मनु तथा शतरूपा की पुत्री थी। उत्तानपाद और प्रिया उसके दो भाई थे। महर्षि रुचि के साथ उसका विवाह हुआ था। यश और दक्षिणा दोनों उसकी संतानें है।

अकृतव्रण

हिमालय में रहने वाले गांव ऋषि का पुत्र जो एक बार व्याघ्र के भय से चिल्लाता हुआ भाग रहा था। उसी समय परशुराम वहाँ आ उपस्थित हुए। उन्होंने व्याघ्र को मार डाला। बाद में अमृत बाण परशुराम का शिष्य बन गया और सदा उनके साथ लगा रहा।

अक्रूर

ये वसुदेव (दे.) के भाई बताए जाते हैं। कंस को सलाह पर श्री कृष्ण और बलराम को यही वृन्दावन से मथुरा लाए थे कंस का वध करने के पश्चात श्रीकृष्णदत्य इनके पर गए थे। वे अकूर को अपना गुरु मानते थे स्वाजित नामक यादव को सामंतक म, सी पोरी का फलक श्रीकृष्ण को लगा था. उन्हीं के पास थी ये डरकर मणि को लेकर काफी चले गए। स्यमंतक मणि की यह विशेषता थी कि जहां वह होती वहां धन-धान्य भरा रहता था। अकूर के चले जाने पर द्वारका में अकाल के लक्षण प्रकट होने लगे। इस पर श्रीकृष्ण का अनुरोध मानकर अकूर द्वारका वापस चले आए। उन्होंने स्यमंतक मणि श्रीकृष्ण को दे दी। श्रीकृष्ण ने मणि का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करके अपने ऊपर लगा चोरी का कलंक मिटाया |

अक्रूर घाट

मथूरा और वन के योग में ब्रह्म हृदा नामक एक स्थान है। श्रीकृष्ण ने यहीं पर अंकुर को दिव्य दर्शन कराए थे। व्रज क्षेत्र का यह भी एक प्रमुख तीर्थ माना जाता है और वैशाख शुक्ल नवमी को यहां मेला लगता है।

अक्ष

रावण और मंदोदरी का पुत्र, जो हनुमान द्वारा अशोक वन ध्वस्त किए जाने पर उन्हें पकड़ने के लिए गया। इसके पूर्व रावण के पांच योद्धा हनुमान के हाथों मारे जा चुके थे। अंत में अक्ष भी युद्ध करता हुआ मारा गया ।

अक्षय चतुर्थी

जो चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है, उसे अक्षय चतुर्थी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन उपवास करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

वैशाख शुक्ल तृतीया की तिथि अक्षय तृतीया कहलाती है। मान्यता है कि इसी तिथि से सतयुग का आरंभ हुआ था। इस दिन किए गए दान, जप आदि के फल का क्षय नहीं होता। नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार इसी तिथि को हुआ था। यदि सोमवार अथवा कृतिका या रोहिणी नक्षत्र के साथ यह तिथि पड़ती है तो और भी उत्तम मानी जाती है। व्रत के रूप में अक्षय तृतीया का विशेष महात्म्य है। प्रसिद्ध तीर्थ बदरीनाथ के कपाट इसी तिथि को खुलते है। इस दिन जल से पूर्ण पात्र, पंखा, जो का सत्तू, गुड़ अथवा चीनी, दही आदि वस्तुओं के दान करने का नियम है। भविष्य पुराण के अनुसार अन्य अतिथियों के बारे में सोचने से क्या लाभ होगा। केवल अक्षय तृतीया का माहात्म्य सुन लेना ही पर्याप्त है।

अक्षय नवमी

कार्तिक अक्षय नवमी कहते हैं। पुराणों के अनुसार त्रेतायुग इसी तिथि से आरंभ हुआ था। इस दिन व्रत, पूजा, तर्पण तथा दान का फल अक्षय होता है। इस तिथि को आंवले के वृक्ष के नीचे पूजन करने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराकर स्वयं परिवार भोजन करने का विधान है। इस दिन विष्णु ने ऊष्मांड नामक दैत्य का वध किया था।

अक्षय पात्र

युधिष्ठिर के पास एक ऐसा पात्र था जिसमें पकाया हुआ थोड़ा सा अन्न भी कभी समाप्त नहीं होता था। यह पात्र युधिष्ठिर को उनके द्वारा की गई आराधना से प्रसन्न होकर सूर्य ने दिया था।

अक्षयवट

प्रयाग (इलाहाबाद) में गंगा-यमुना के संगम पर स्थित किले के अंदर का बरगद का वृक्ष अक्षयवट के नाम से प्रसिद्ध है। पुराणों के अनुसार इस वृक्ष की पूजा से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। पौराणिक उल्लेखों में कहा गया है कि प्रलय होने पर जब समस्त सृष्टि जलमग्न हो जाती है तब केवल अक्षयवट बच जाता है। उस समय भगवान विष्णु इसके एक पत्ते पर लेटे हुए अंगूठा चूसते हुए दिखाई देते हैं। अकबर द्वारा निर्मित किले के अंदर का वटवृक्ष उसी अक्षयवट का अवशेष बताया जाता है। चीनी यात्री ह्वेनसांग (दे.) ने भी अपनी यात्रा वर्णन में इसका उल्लेख किया है।
प्रयाग के अतिरिक्त गया में भी एक अक्षयवट है। कहा जाता है कि पांडवों ने वनवास काल में इसके दर्शन किए थे।

अक्षांश

खगोल विद्या में पृथ्वी के मध्य में भूमध्य रेखा कल्पित की गई है। इस रेखा के समानांतर उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव की ओर जो समानांतर रेखाएं कल्पित हैं वे अक्षांश कहलाती हैं- उत्तर की ओर उत्तरी अक्षांश और दक्षिण की ओर दक्षिणी अक्षांश। पृथ्वी के किसी स्थान से सूर्य कितनी ऊंचाई पर होगा यह उस स्थान के अक्षांश पर निर्भर करता है।

अक्षौहिणी

प्राचीन काल में सेना की गणना की प्रमुख इकाई अक्षौहिणी थी। इसमें 109350 पैदल, 65610 घोड़े, 21870 रथ और 21870 हाथी होते थे। उनका संध्या का योग 218700 होता है। इन संख्याओं की एक विशेषता है। प्रत्येक संख्या का जोड़ 18 बनता है। उस समय सेना की गणना से ऊपर तक इस प्रकार की जाती थी-पत्ति, सेनामुख, गुल्म, वाहिनी, पूतना, चमू अनीकिनी और अक्षौहिणी। अक्षौहिणी को छोड़कर शेष में अपने पहले के अंग से तिगुनी संख्या होती थी।
महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से ग्यारह और पांडवों की ओर से सात,
इस प्रकार कुल अठारह अक्षौहिणी सेनाओं ने भाग लिया था।

अगति

1. प्राचीन भारतीय मान्यता के अनुसार मरणोपरांत अंत्येष्टि क्रिया, श्राद्ध आदि करना आवश्यक है। यदि किसी कारण यह सब न किया जाए तो मृतक की आत्मा अर्थात की स्थिति में इधर-उधर भटकती रहती है।
2. केशवदास ने ऐसे वयं विषयों को गणना की है जो अचल या स्थिर हैं।
उन्हें अगति कहते हैं। ये है सिधु, गिरि, ताल, तरु, यापि और कूप ।

अगम्या

यम पुराण के अनुसार इन स्त्रियों को पुरुष के लिए समागम के योग्य बताया गया है- गुरु-पत्नी, राजा की स्त्री, सौतेली माता, तथा उसकी कन्या, पुत्री, पुत्र की स्त्री, गर्भवती स्त्री, सास, बहन, भाई की पत्नी, शिष्या, भतीजी, शिष्य की पत्नी, भांजी और भतीजे की पत्नी। इस वर्जन को न मानने वाले व्यक्ति को 100 ब्रह्म हत्याओं का पाप लगता है। वह लोक और वेद में निन्दित मान जाता है तथा कुम्भीपाक नरक में जाता है।

अगलस्स

जिस समय सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया, देश के पश्चिमी भाग में अनेक छोटे-छोटे गणराज्य थे। अगलस्स भी सिंधु की घाटी के निचले भाग में शिवि के पड़ोस में स्थित एक गणराज्य था जब सिकन्दर आक्रमण के बाद वापस लौट रहा था तब इस गणराज्य के नागरिकों ने अपनी शक्ति भर उसका सामना किया। असीमित शक्ति के कारण उन्हें पराजित तो होना पड़ा, पर शत्रु के हाथ में पड़ जाने के भय से सब लोग स्वयं जलकर मर गए।

अगस्त्य

पुलस्त्य ऋषि के पुत्र अगस्त्य के संबंध में पुराणों में अनेक विवरण मिलते हैं। लोक प्रसिद्ध है कि इसकी उत्पत्ति घड़े से हुई थी, इस कारण इन्हें कुम्भज तथा पटज भी कहा जाता है। जन्म के समय उनकी लम्बाई एक अंगूठे के बराबर पी। ये ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं के दृष्टा माने जाते हैं। विंध्याचल पर्वत और समुद्र का मान-मर्दन करने के प्रसंग में भी उनकी प्रसिद्ध 850 है। कहा जाता है कि विंध्याचल को इस बात से बड़ी ईर्ष्या थी कि सभी लोग सुमेरु पर्वत का सम्मान करते हैं, उसका सम्मान कोई नहीं करता। इस ईर्ष्या से विंध्याचल ने अपनी ऊंचाई बढ़ाकर सूर्य का मार्ग अवरुद्ध कर दिया। इस स्थिति के निवारण के लिए देवताओं की प्रार्थना पर अगस्त्यमुनि विंध्याचल के पास पहुंचे। मुनि शाप न दे दें, इस भय से विंध्याचल उनके चरणों में झुक गया। अगस्त्य ने विंध्याचल से उस समय तक रुके रहने के लिए कहा, जब तक वे वापस न लोट पर अगस्त्य मुनि फिर लौटकर नहीं आए और विंध्याचल तब से झुका हुआ बड़ा है। समुद्र से अगस्त्य एक बार क्रुद्ध हुए। देवासुर संग्राम में जब दानव सागर में
छिप गए तो अगस्त्य ने क्रोध में आकर उसका सारा जल पी डाला था। विंध्याचल के दक्षिण प्रदेशों में आर्य संस्कृति के प्रसार का श्रेय भी अगस्त्य मुनि को दिया जाता है। दक्षिण के ऋषियों में ये सबसे अधिक सम्मान प्राप्त ऋषि थे। महाभारत के अनुसार उनकी पत्नी का नाम लोपामुद्रा था जो बड़ी विदुषी थी। ‘रामचरित मानस’ में उल्लेख है कि पंचवटी पहुंचने से पहले राम अगस्त्यमुनि से मिले थे।

अगस्त्य आश्रम

अगस्त्य ऋषि के आश्रम देश में कई स्थानों पर बनाए जाते हैं। एक स्थान नासिक के दक्षिण-पूर्व में है जो अगस्तीपुरी कहलाता है। महाराष्ट्र के कोल्हापुर, उत्तर प्रदेश के एटा, गढ़वाल के रुद्रप्रयाग और कुंडर में भी इनके आश्रम बताए जाते है।

अग्नि

आरंभिक युग के मनुष्य का अग्नि से परिचय नहीं था। वह न तो अग्नि उत्पन्न करना जानता था और न ही उसका उपयोग ही करता था। शायद जंगलों में लगी आग को देखकर वह डरता था। फिर उसने लकड़ी की रगड़ से आग का जलना देवा होगा और उसमें भुने हुए मांस का स्वाद चखा होगा। उसने अग्नि से प्राप्त होनेवाली गर्मी का भी अनुभव किया होगा अब मनुष्य अग्नि की उपयोगिता जान गया। इसी से अग्नि के प्रति पूजा भाव की उत्पत्ति हुई।
संसार के सभी प्राचीन धर्मों में प्रतिष्ठित और प्रधान देवता के रूप अग्नि की पूजा होती आई है। वेदों में इसका प्रमुख स्थान सुरक्षित है। यूनान और रोम में भी अग्नि की पूजा होती थी। पारसी धर्म में तो अग्नि को इतना पवित्र माना जाता है कि कोई अमूल वस्तु अग्नि में नहीं डाली जाती। भारत में अग्नि को जो स्थान प्राप्त रहा है वह अन्यत्र नहीं वेदों में इन्द्र के बाद सबसे अधिक स्तुति अग्नि देवता की की गई है।

अग्नि फुल

प्राचीन अध्ययन के अनुसार ऋषियों के यज्ञ में दैत्य विघ्न डाला करते थे। इस पर आकर्षक पुरुष की उत्पत्ति के उद्देश्य से ऋषियों ने महर्षि वशिष्ठ के नेतृत्व में आबू पर्वत पर एक यज्ञ किया। यज्ञ कुंड से चार पुरुष उत्पन्न हुए। इससे स्त्रियों के इन चार खेलों का आरंभ माना जाता है- परमार, परमार, चालुक्य या सोलंकी तथा चौहान। इन चारों की गणना अग्निकुल के अंतर्गत होती है।

अग्नि-परीक्षा

स्कंद पुराण, रामायण आदि से पता चलता है कि प्राचीन काल में अपराधी का पता लगाने के लिए अग्नि-परीक्षा का भी प्रचलन था। अभियुक्त को आग पर चलकर अपने आपको निर्दोष सिद्ध करना होता था। जिसने अपराध न किया हो उसे आग पर चलने से कोई हानि नहीं होती थी और वह निर्दोष घोषित कर दिया जाता था। राम-रावण युद्ध के बाद इसी परंपरा के कारण सीता को भी अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी थी।

अग्नि पुराण

अठारह पुराणों का जो क्रम निर्धारित किया गया है, उसके अनुसार अग्नि पुराण आठवां पुराण है। इसका रचनाकाल सातवीं शताब्दी के आसपास माना जाता है। विषयों के विस्तार की दृष्टि से इस पुराण को अनेक विद्वान विश्वकोश का महत्व देते हैं। 383 अध्याय और लगभग 16 हजार श्लोकों के इस ग्रंथ में भारतीय संस्कृति और ज्ञान का भंडार भरा है। इसमें अवतार, सृष्टि की उत्पत्ति आदि के साथ-साथ कर्मकांड, राजधर्म, आयुर्वेद, विधि-विधान, काव्य शास्त्र, दर्शन, ज्योतिष, धनुर्वेद, मंदिर निर्माण, सैनिक शिक्षा पद्धति आदि सभी का समावेश है। ऐतिहासिक जनश्रुतियों की दृष्टि से भी यह ग्रंथ बड़े महत्व का माना जाता है।

अग्निमित्र

शुंग वंश (दे.) के संस्थापक पुष्यमित्र का पुत्र, जो 149 ई. पूर्व में अपने पिता के उत्तराधिकारी बना। इससे पूर्व अपने पिता के शासनकाल में वह नर्मदा प्रदेश का उपराजा था। उसने विदिशा (आधुनिक भेलसा) को अपनी राजधानी बनाया और अपने पड़ोसी विदर्भ (बरार) के राजा को पराजित करके अपना राज्य वर्धा नदी के तट तक फैला दिया। इसने आठ वर्ष तक राज्य किया। महाकवि कालिदास ने अपने नाटक ‘मालविकाग्निमित्र’ में अग्निमित्र को प्रेम कथा का वर्णन किया है।

अग्निवेश

ये आयुर्वेद के प्रमुख आचार्य और अपने गुरु पुनर्वसु आने के सबसे प्रतिभाशाली शिष्य थे। आगे चलकर चरक ने इनके लिखे हुए आयुर्वेद के ग्रंथ ‘अग्निवेश तंत्र संहिता का संस्कार करके उसका नाम ‘चरक संहिता’ रखा। यह ग्रंथ आज भी आयुर्वेद का प्रमुख ग्रंथ माना जाता है।

अग्निवंश

1. अगस्त्य ऋषि का एक शिष्य, जो भारद्वाज का छोटा भाई था। दुवद और द्रोणाचार्य ने धनुर्वेद की शिक्षा इसी से पाई थी। उन्हें ब्रह्मशिर अस्त्र भी उसी ने दिया था ! 2. भागवत के अनुसार इसके मानुष्यं और कानीन नामक नाम भी मिलते हैं। उसने तपस्या के द्वारा ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था।

अग्निहोत्र

एक विशेष प्रकार का यज्ञ जिसके दो रूप होते हैं। एक तो एक महीने की अवधि तक किया जाता है और दूसरा जीवन-भर जीवन भर चलने वाले इस यज्ञ में प्रातः और सायंकाल अग्नि में हवन करते हैं। इस प्रकार के अग्निहोत्र करने वाले व्यक्ति का दाह-संस्कार भी उसी अग्नि से किया जाता है। पहले दस चीजों से होम करने का नियम था कलयुग में यह घटकर दूध, चावल और में सपने आने तक ही सीमित रह गया।

अग्रदास

रामभक्ति के माधुर्य भाव को प्रकट करने में अग्रणी अग्रदास का समय 1556 ई. के आसपास माना गया है। ये स्वामी नाभादास के गुरु थे। ये बारहों महीने रास किया करते थे। इन्होंने वैष्णवों की अनेक गाड़ियां स्थापित की। उनकी साधना स्थली रैवासा (राजस्थान) थी। वहीं उन्होंने जानकीवल्लभ की उपासना की ।कस का अनुचर एक रात उसके बड़े भाई बकासुर और बड़ी बहन पूतना कसने के के लिए भेजा था परंतु वे दोनों कृष्ण के द्वारा मार डाले गए। तब कसने अपार को वहां भेजा अपने भाई-बहन का बदला लेने के लिए उसने विशालकाय अजगर का रूप धारण किया और मह खोतकर सेट गया। अपने गोराओं के साथ उसी वन में विचरण कर रहे थे। अगर राक्षस की वास्तविकता न जानने के कारण जिज्ञासावश बालक उसके मुख में चले गए। इसपर श्रीकृष्ण ने उसके मुख पर सोधे पड़े पक्का इतना विस्तार किया कि अघासुर की सांस एक गई और उसने दम तोड़ दिया।

अघोरपंथ

एक जिसका आरंभ अथर्ववेद के काल से माना जाता है। इस मत के अनुयायी तंत्र में विश्वास करते हैं। वे गुरु और संतों की समाधि की पूजा करते है। मान-साधना मंत्र साधना, पंचमकार (दे.) सेवन, चिता-भस्म रमाना इनका जीवन स होता है। मूतमांसाहार और मल-मूत्र आदि के सेवन से भी वे परहेज नहीं करते। इस प्रकार के आचरण को पोर साधना का प्रतीक मानते है। इन्हें सभंग अवधूत या का मालिक के नाम से भी जाना जाता है। इस समय इस पद के अनुयायी न्यूनाधिक संख्या में पूरे भारत में मिलते हैं। इस कार्तिक संबंध इस समय गोरखपुर और तंत्र प्रधान व मत से माना जाता है। अघोरपंथी निर्वाणी और गृहस्थ दोनों प्रकार के होते हैं। उनकी वेश भी होती है। वर्तमान काल के अघोर पंथियों में बाबा कीनाराम का नाम प्रसिद्ध है। वे वाराणसी के निवासी और अनेक ग्रंथों के रचयिता थे।

अचल

गांधार देश के राजा का पुत्र और शकुनि का भाई यह युधिष्ठिर के राजसूय मज में सम्मिलित हुआ था। उसने महाभारत युद्ध में भी भाग लिया और अर्जुन के हाथों मारा गया।

अचलेश्वर

उत्तर भारत में कार्तिकेय का यह एकमात्र मंदिर पंजाब में अमृतसर-पठानकोट रेलवे लाइन के निकट स्थित है। मुख्य मंदिर में शिवलिंग तथा स्वामी कार्तिकेय और पार्वती की मूर्तियां है। यहां एक बड़ा सरोवर है। उसके मध्य में भी शिव मंदिर बना है।एक बार गणेश और कार्तिकेय में घष्ठता के संबंध में विवाद छिड़ गया। शंकर ने कहा, दोनों भाइयों में से जो पहले पृथ्वी की प्रदक्षिणा करेगा वही धोठ होगा। कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकले। इधर गणेश माता पिता को पृथ्वी से श्रेष्ठ मानकर उनकी परिक्रमा कर सी और ये श्रेष्ठ मान लिए गए। कार्तिकेय को जब परिक्रमा करते समय मार्ग में यह सूचना मिली तो वे उसी स्थान पर अचत रूप में समाधि लगाकर बैठ गए। वही स्थान अब अचलेश्वर कहलाता है। यहां सिद्धों ने यज्ञ किया था और कुछ समय तक नानकदेव ने भी यहां साधना की |

अज

अयोध्या के प्रसिद्ध राजा दशरथ के पिता इनके पिता का नाम दिलीप था। इनका विवाह विदर्भ नरेश की कन्या इंदुमती से हुआ था। कहते हैं अजय को एक गंधर्व से दिव्यास्त्र प्राप्त हुआ था। उसी की सहायता से से स्वयंवर में इंदुमती को प्राप्त कर सके। आज ने अनेक राजाओं को परास्त करके सेशन राज्य का प्रभाव बढ़ाया था। कालिदास रचित ‘रघुवंश’ के अनुसार इन्होंने एक पागल हाथी को मार कर उससे दिव्यास्त्र प्राप्त किया था। आज का एक अर्थ बुरा भी है।

अजंता

महाराष्ट्र प्रदेश में औरंगाबाद नगर से 103 कि. मी. दूरी पर स्थित अजंता पाटीको गुफाएं अपने भित्ति-चित्रों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। यहां पर्यंत अर्धचंद्राकार है और नीने बहारा नदी बहती है। यह स्थान किसी समय उत्तर दक्षिण के व्यापार मार्ग पर स्थित था। यहाँ कुल 30 गुफाओं का पता चला है। ये सब बौद्ध गुफाएं हैं। इनका निर्माण काल 200 ई. पूर्व से लेकर 600 ई. सन तक माना जाता है। यहां के चित्रों में मानव-जीवन, पशु-पक्षी जगत् और प्रकृति का बहुरंगी चित्रण मिलता है। वास्तुकारों और कलाकारों ने प्राकृतिक गुफाओं का उपयोग न करके पश्चिमी घाट के पहाड़ों की ठोस चट्टानों को काट कर गुफाएं बनाई। उनमें चित्र बनाने के लिए चूने की मोटी तह जमाई गई है और निकटवर्ती स्थानों में पाये जाने वाले प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया गया है। कालक्रम के अनुसार बुद्धि के हीनयान संप्रदाय के समय की गुफाएं शादी और बाद के महाबान काल की गुफाएं अधिक अलंकृत तथा गौतम बुद्ध के चित्रों से युक्त है। यद्यपि समय बीतने के साथ चित्र धुंधली पड़ने लगे हैं फिर भी उनके रंगों और कलात्मकता को देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। जिन गुफाओं में प्रकाश की कमी है, वहां अब दर्शकों को सुविधा के लिए बिजली का प्रबंध हो गया है।

अजपा जाप

रिद्धि और नाभियों में प्रचलित वह जप में माला फेरने या अन्य किसी प्रकार से नाम की गिनती नहीं की जाती। कबीर ने भी आने-जाने वाली सांसो से होने वाले जप को अजपा जाप ही कहा है।