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मसूर की खेती

विश्व के सभी देशों में मसूर की खेती की जाती है। भारत में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, बंगाल और तमिलनाडू में इसकी खेती की जाती है। राजस्थान में भी इसकी खेती होने लगी है।

  1. मिट्टी मसूर की खेती के लिए दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त रहती है क्योंकि इसमें पानी को सोखकर नमी बनाये रखने की क्षमता होती है, जो हर फसल के लिए लाभकारी होती है। ऐसी मिट्टी राजस्थान के दक्षिणी भाग, बंगाल, उत्तर प्रदेश के पश्चिम भाग व मध्य प्रदेश में पाई जाती है।
  2. खाद- मसूर में खाद देने की आवश्यकता नहीं होती, नाइट्रोजन के लिए पशुओं का पिशाब व राख की खाद अच्छी रहती है।
  3. सिंचाई मसूर की खेती के लिए अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन वर्षा के कमी के कारण एक दो सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है। सिंचित व असिंचित पैदावार में फर्क रहता है। सिंचाई से दाल मजबूत बनती है। असिंचित का दाना बारीक रहता है।
  4. बुवाई का समय इसको गेहूं के साथ अक्टूबर व नवम्बर में बोया जाता है। इसमें बीज की मात्रा 40 से 45 किलो प्रति हैक्टर के हिसाब से लगती है। बुवाई छिटकवा तथा पंक्तिबद्ध दोनों तरीकों से की जाती है।
  5. बीज की मात्रा – इसमें बीज की मात्रा 40 से 50 किलो प्रति हैक्टर के हिसाब से होती है।
  6. निराई-गुड़ाई – इसमें निराई गुड़ाई की आवश्यकता नहीं होती है। फिर भी अगर निराई गुड़ाई कर दी जाये तो उत्पादन अच्छा होता है।
  7. कटाई ये फसल मार्च-अप्रैल में तैयार हो जाती है। इनके पौधों के उपरी भाग को, जहां पर फलियां लगी होती है, वहां से काट दिया जाता है और सुखा दिया जाता है। सूखे हुए पौधे को झाड़कर मसूर के दानों को अलग निकाल लिया जाता है।
  8. शेष अवशेष मसूर निकालने के बाद शेष अवशेष को जलाकर खाद के रूप में काम लिया जाता है।
  9. उत्पादन- इसका उत्पादन 12 से 16 किंटल प्रति हैक्टर के हिसाब से होता है।
  10. बाजार भाव – मसूर की दाल बनायी जाती है। उसका बाजार भाव 4000-5000 रूपये प्रति क्विंटल के लगभग मिलता है।
  11. निर्यात – हमारे देश में पूर्ति के अलावा इसका निर्यात किया जाता है। आयात नहीं – करना पड़ता है।

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