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मेथी की खेती

मेथी की खेती हमारे देश में आदिकाल से ही की जाती है – एक मोटी होती है तथा दूसरी बारीक। मोटी को सब्जी मसाले आदि में काम लेते हैं। इसकी पत्तियाँ बड़ी होती हैं। दूसरी को लालर मेथी कहते हैं, इसकी पत्तियाँ छोटी होती हैं। खुशबू ज्यादा होने के कारण इसकी पत्तियों का उपयोग सब्जी में करते हैं तथा दाना दवा में काम आता है। ये दोनों ही स्वाद में कटु व खूब गुणकारी होती हैं। ये बात, कफ, ज्वर – त्रिदोष नाशक होती हैं, पाचन शक्ति को बढ़ाती हैं। यह अजीर्ण व शारीरिक कमजोरी, जोड़ों में दर्द, सूजन, गठिया, मधुमेह, अनिद्रा के साथ मोटापा दूर करती है। हमारे ऋषि मुनियों ने इसको मानव व पशु दोनों के लिए ही उपयोगी माना है। यह वायु नियंत्रण करती है। इसको साबुत या पाउडर बनाकर काम में लिया जाता है। लेकिन पाउडर ज्यादा समय तक नहीं रखा जा सकता, दाने को हम लम्बे समय तक रख सकते हैं।

  1. जमीन की तैयारी:- मेथी प्रायः सभी प्रकार की भूमि में होती है, लेकिन काली दुमट व नदियों के बहाव की मिट्टी में ज्यादा पैदा होती है। इसका दाना बारीक, चपटा व पीले रंग का होता है।
  2. बुवाई:- पहले जमीन को पलावा कर के तथा 80 से 100 क्विंटल तक सड़ा हुआ खाद डालकर फैलाया जाता है, तुरन्त 2-3 गहरी जुताई करके छोड़ देते हैं।
  3. बीज की मात्रा:- मेथी का बीज 20 से 25 किलो प्रति हैक्टर के हिसाब से छिड़क कर पाटा फेरते हैं। इसमें मूली, हाल्यू, सरसों व रावा आदि भी छिड़कर फसल ले सकते हैं। लेकिन मेथी के बीज की मात्रा कम करनी होगी। इसके पश्चात क्यारियाँ बनाकर छोड़ देते हैं।
  4. पानी की मात्रा : – वैसे तो मेथी में पाँच-छ: पानी लगाते हैं। पलावा के बाद पहला पानी, बुवाई से 25 दिन बाद दूसरा पानी तथा बाकी पानी 15 दिन के अन्तराल पर दिये। जाते हैं।
  5. खरपतवार निकालना :- पहले पानी के तीन-चार दिन बाद खरपतवार निकालना शुरू कर देते हैं। इसमें खुरपी की सहायता से खरपतवार निकालकर वहीं छोड़ देते हैं, जिससे हरा खाद बन जाता है। पाँच-छ: दिन की धूप लगाते हैं, जिससे सूर्य की रोशनी से मिलने वाला नाइट्रोजन पौधे को मिलता है। फिर पौधों को पानी देकर छोड़ देते हैं। तब तक फूल आना शुरू हो जाता है। फूल आते वक्त पानी की मात्रा कम करनी पड़ती है, किसी भी फसल में या पेड़-पौधों में फूल आते समय पानी नहीं देना चाहिए क्योंकि इससे फूल झड़ जाते हैं तथा फलियाँ कम आयेंगी, जिसका प्रभाव उत्पादन पर पड़ता है।
  6. रोग नियंत्रण:- जब मेथी में फूल आकर फलियाँ बनना शुरू होता है, उस समय ओस पड़ने पर एफिड़ (अळ) का प्रभाव बढ़ जाता है। उसके बचाव के लिए चूना, राख समान मात्रा में मिलाकर तीन किलो प्रति बीघा के हिसाब से उड़ायें। छाछिया बीमारी लगने पर प्रति हैक्टर 8 लीटर गाय की छाछ लें व 20 ग्राम प्रति किलो के हिसाब से नमक व 20 ग्राम पिसी हुई राई, छाछ में डालकर तीन-चार दिन तक धूप में रख दें तथा पाँच गुणा पानी मिलाकर एक टंकी में एक लीटर घोल डालकर स्प्रे करें।
  7. कटाई :- मेथी की कटाई प्रायः जौ-गेहूँ के साथ होती है। इसमें एक फली को तोड़कर छीलकर दाने में नाखून लगायें, दाना पकने पर कटाई करें, कच्चा रहने पर दो-चार दिन छोड़ते हैं। पकने पर कटाई करके चार-पाँच दिन तक धूप में छोड़ दें। पूरे पौधे सूख जाने पर जानवरों से घवाई करवा लें अन्यथा मशीन की सहायता से निकलवायें।
  8. भण्डारण:- भण्डारण से पहले मेथी को सुखाकर नमी निकालें। बाद में बोरियों में भरकर सरसों की तूड़ी या चारे में दबा दें इससे दाना खराब नहीं होगा।
  9. चारा :- इसके अवशेष (चारा ) ऊँट, गाय, भैंस, भेड़ व बकरियों के लिए पौष्टिक रहता है। इसके चारे को खाने वाले जानवर तन्दुरुस्त रहते हैं। इसमें खुशबू रहती है, इसे गेहूँ के तूड़े व कुट्टी में मिलाकर खिलाया जाता है तथा कुछ किसान इसको सड़ाकर कम्पोस्ट खाद भी बनाते हैं जिससे भूमि में मोहिला रोग पर नियंत्रण रहता है।

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