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गेहूं की खेती

गेहूं

गेहूं भारत वर्ष में रहने वाली 60 प्रतिशत जनसंख्या के भोजन के काम में आता है। इसके दाने को हाथ की चक्की या चक्की से पीस कर आटा तैयार करते हैं। जिससे चपाती आदि बनाकर खाने के फाम में लिया जाता है। इसको ज्यादा बारीक पीसकर मैदा तैयार की जाती है। जिससे मिठाई आदि व नमकीन बनाने के फाम लिया जाता है। प्राय: गेहूं से रोटी पुर-पुए कई मिठाईयां बनाई जाती है। इसके दाने के रंग से ही गेहुंआ रंग कहा जाता है। इस पर एक लम्बी लाईन होती है तथा बीच का हिस्सा मोटा होता है। आजादी से पूर्व हमारे देश में मेहंधनाइप लोगों के भोजन में ही काम आता था क्योंकि यहां के कृषक इसकी खेती फम करते थे। इसलिए उपज कम होती थी। इसके लिए पुरानी एक कहावत प्रचलित है।*

*पिछले दिनों हुए विभिप्रयोगों के अनुसार जिला स्तर पर पहाँ के पानी मिट्टी, पर्यावरण को देखते हुए गेहूँ एवं अन्य अनाज की बेराई निर्धारित की गयी है। जिला कृषि विभाग या कृषि सेवक के संपर्क कर बेका चाहिए |

गेहूं कहे मेरो फारयोपेट मन खायलो मोटों सेठा

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  1. मिट्टी:- गेहूं के लिए दोमट मिट्टी अच्छी रहती है। इसमें गेहूं की पैदावार अच्छी होती है। बालू मिट्टी में इसकी पैदावार फम होती है। नदियों द्वारा बहाकर लाई गई मिट्टी या नदियों के मुहाने पर गेहूं का उत्पादन ज्यादा होता है। इसके लिए मुख्य रूप से दोमट मिट्टी अधिक अच्छी रहती है।
  2. खाद:- गेहूं उत्पादन के लिए खाद की आवश्यकता ज्यादा होती है। अतः गोबर की खाद इसके लिए ज्यादा लाभकर होती है। इसके लिए 60 मन गोबर की खाद (प्रति बीपा के हिसाब से होनी चाहिए)। गोबर की खाद गड्ढों में सड़ाकर कम्पोस्ट खाद तैयार कर लेते हैं। यह खाद गेहूं के लिए 20 मन प्रति बीघा के हिसाब से जमीन में डाली जाती है।
  3. पानी:- गेहूं उगने के 20 से 25 दिन के अंदर पानी दिया जाता है। उस समय इसकी जड़े फूटना शुरू हो जाती है। इसके बाद 15 दिन के अन्तराल में पानी दिया जाता है। बाली आने पर 7 से 10 दिन तक के समय में पानी दिया जाता है। लेकिन जहां खारा पानी है वहां पफते समय पानी देनी चाहिए क्योंकि अधिक खारा पानी देने से गेहूं का दाना कमजोर होगा तथा उसका रंग फीका पड़ जायेगा। इससे बाजार भाव कम मिलेगा।
  • बुवाई का समय: गेहूं की बुवाई अक्टूबर से 30 नवम्बर तक की जाती है। तथा आधुनिक फिल्म के बीज 15-20 दिसम्बर तक बोये जाते हैं। जब तापमान 10 डिग्री तक आ जाये तो गेहूं की बुआई चालू हो जाती है। ज्यादा गढ़ी पड़ने पर गेहूं कुछ समय है, कम अंकुरित होता है।
  • निराई गुड़ाई: गेहूं के लिए खरपतवार हटाना अति आवश्यक है। हमारी भूमि में खरपतवार अधिक होते हैं, आकी वजह से गेहूं की फसल कमजोर हो जाती है। खरपतवार हटाने से इसके फूट (न्यादा होती है। जिससे पैदावार अधिक होती है। अत: गेहूं में पहला पानी देवर निराई गुहाई पर देनी चाहिए। निराई गुहाई खुरपी से ज्यादा अच्छी रहती है।
  • कटाई-छंटाई:- गेहूं की फटाई हमारे यहाँ प्राय: मार्च के आखिरी सप्ताह से अप्रैल के पहले सप्ताह में पूरी हो जाती है। हमारे यहां फटाई खेतीहर मजदूर द्वारा दाय से की जाती है। जहां लम्बी खेती है वहां मशीनों द्वारा कटाई की जाती है।
  • गेहूं से चारे को अलग निकालना:- प्रायः पहले गेहूं को चारे से अलग करने के लिए पशुओं को काम में लिया जाता था। उनको गेहूं पर घुमाकर गेहूं अलग निकाला जाता था, लेकिन आज के मशीनीकरण के समय प्रेशर से गेहूं निकाला जाता है।
  • शेष अवशेषों का उपयोग:-गेहूं निकालने के बाद शेष चारा बचता है, जो हमारे पशुओं को चराने के काम में आता है, क्योंकि खेती में पशु किसान से आगे रहते हैं, किसान पीछे। अतः प्रकृति में पहले चरने वाले के लिए चारा, बाद में चलने वाला के लिए अनाज आदि दिया है।
  • उत्पादन:- गेहूं का उत्पादन 70 से 80 फिल्टल प्रति हेक्टचर होता है। हमारे यहां इसको बहुत अच्छा उत्पादन मानते हैं। प्राय: 40 से 50 किन्टल प्रति हेक्टयर तक ही गेहूं उत्पादन होता है।
  • बाजार भाव: गेहूं का भाव प्रतिवर्ष बढ़ता ही जा रहा है। इस समय 2000 से 2400 रूपये के हिसाब से गेहूं का बाजार भाव है। जैविक खाद से तैयार गेहूं 4000/- प्रति किन्टल तक बिकते हैं।
  • लाभ:- गेहूं के बोने पर किसान को 25 से 30 हजार रूपये प्रति हैक्टर से व अधिक से अधिक 40 से 50 हजार रूपये के हिसाब से आमदनी होती है।
  • आयात हमारे देश में कृषि प्राय: वर्षा पर निर्भर होती है, जिस वर्ष वर्षा कम होती है, जो सूख जाते हैं, पानी की कमी होने से हमारा उत्पादन कम होता है। हमारे यहां पानी की कमी से कम उत्पादन होने पर मेह कम पैदा होती है। जनसंख्या अधिक होने पर गेहूं का बाहर देशों से आपात होता है। लेकिन कुछ वर्षों में आयात नहीं हो रहा
  • निर्यात:- आज हमारा देश खाधान आत्म निर्भर है। हमारे यहाँ ज्यादा गेहूं का उत्पादन होने के कारण गेहूं का निर्यात किया जाता है, जिससे विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। जो हमारे देश की आर्थिक स्थिति को ज्यादा मजबूत करती है।
  • भण्डारण व्यवस्था प्रायः सभी उत्पादन को सुरक्षित रखने के लिए मारण की व्यवस्था की आवश्यकता होती है। जिससे हमारा उत्पादन खराब नहीं हो। परम्परागत तरीके से हमारे देश में पहले गेहूं को सुरक्षित रखने के लिए अच्छी व्यवस्था नहीं थी। जिससे हमारा गेहूं उत्पादन का अधिक भाग खराब हो जाता था और उन्हें जाते थे जो खाने के योग्य नहीं था। लेकिन अब भारत सरकार के खाधान विभाग की गई है जिससे द्वारा किसानों के लिए अच्छी फिल्म के अनाज भण्ठारों की व्यवस्था। अनाज खराब नहीं होता है तथा किसान भी पढ़े-लिखे होने के कारण अनाज को भूखे के अन्दर बोरियों में भरकर रख देते हैं। जिससे नमी नहीं मिलने के कारण सुक्ष्म जसनमा से होने वाले रोग तथा चूहों द्वारा होने वाले नुकसान से बचाया जाता है। यानी कीटाणु से होने वाले रोग कबे तक ये अनाज खराब नहीं होता। कई परिवार, जहां पूरे परिवार के लिए सात भर तक गेहूं रखना जरूरी है। उनको फीटों से बचाने के लिए उन पर 100 ग्राम प्रति किटंल के हिसाब से इंडोली का तेल लगाकर छाया में रख देते हैं। इसके लगाने है ने से गेहूं में किसी भी प्रकार के फिटाणुओं का प्रकोप नहीं होता व लम्बे समय तक गेहूं ठहर जाता है।
  • सावधानियां:- ज्यादा मात्रा में इन्डोली के तेल का लेप न करें इससे छोटे बच्चों को दस्त होने का भय रहता है। इस प्रकार गेहूं को बचाया जा सकता है। सल्फास रखने से घर में कई प्रकार की घटनाएं घट सकती है। हमारे परम्परागत तरीके ही बेहतर है।

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