धान की खेती

चावल (धान)

वैज्ञानिकों ने खोजा धान की पैदावार बढ़ाने वाला जीनोम - Meri Kheti

इसकी खेती सारी दुनिया में की जाती है। परन्तु संसार का 80 प्रतिशत धान भारत में होता है। यह अधिक पानी चाहने वाली फसल है। इसकी फसल में पानी भरा हुआ होना चाहिए। इसमें पानी की निकासी की आवश्यकता नहीं होती है। धान ऐसा पौधा है जिसकी पौध तैयार करके लगायी जाती है। इसका पौधा गेहूं व जी से मिलता-जुलता है। एक मीटर तक लम्बाई होती है। पकने पर गेहूं की तरह भूरा हो जाता है।

  1. मिट्टी:– धान की खेती के लिए चिकनी दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। काली चिकनी मिट्टी में पानी को लम्बे समय तक रोकने की क्षमता होती है। जो बालु मिट्टी में नहीं होती, अतः चिकनी मिट्टी चावल के लिए आवश्यक है।
  2. खाद:- जिस खेत में धान की पौध लगानी हो, उसमें मई के अन्त तक धान बो देते हैं। उस खेत में धान के पौध लगाने से तीन दिन पूर्व प्रति एकड़ पंद्रह गाड़ी गोबर की खाद डाल दें। इसमें फेचुएं की खाद तैयार नहीं हो सकती है क्योंकि पानी भरा रहता है। खाद मिलाकर बड़े-बड़े क्यारी बनाते हैं जिसमें चार माह पानी भरा रहता है।
  3. पानी:- इसके लिए अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है। जिस जगह नहरों का सापन हो या काली मिट्टी हो, जहां वर्षा का पानी भरा रहे, उस जगह चावल की खेती की जाती है।
  4. पौध तैयार करना:- दो-तीन जुलाई के बाद खाद डालकर तथा जमीन को समतल बनाकर बीज छिड़के जाते हैं। 50-60 किलो बीज एकड़ के हिसाब से छिड़का जाता है। छिड़कने से पूर्व बीज को 8-10 घण्टे तक पानी में भिगोया जाता है। भिगोये हुए बीजों को छिड़कते हैं। बीज बोने के लिए 25 x 5 फिट की क्यारियां जो जमीन से उठी हुई होनी चाहिए। कई जगह बीज को नमक के पानी में भिगोकर सुखाया जाता है, फिर क्यारियों में छिड़का जाता है। इस तरह तैयार पौध में से पांच से सात तक के पत्तियां बन जावे या 10 इंच तक लम्बाई हो, उखाड़ कर पानी के अन्दर लगाया जाता है। प्याज की पौध की तरह दो-तीन इंच के अन्तराल पर पौध लगाया जाता है।
  5. बुआई का समय:- इसकी पौध तैयार होने पर जून के आखिरी सप्ताह या • जुलाई के पहले सप्ताह में लगाई जाती है। अलग-अलग वातावरण के अनुसार समय अलग-अलग होता है।
  6. निराई-गुड़ाई:- हर 15 दिन फसल की निराई-गुड़ाई करते हैं। दाने की दुधिया स्थिति के 10 दिन पूर्व ही निराई-गुड़ाई बन्द कर देते हैं। इससे पौधा गिरने से बच जाता है तथा पैदावार अच्छी होती है। पानी में फैलने वाले पौधों को बाहर निकाला जाता है।
  7. कटाई, छंटाई:- नवम्बर के अन्त तक फसल पक जाती है। तब इसकी बालीयों को हसिए से काट लिया जाता है।
  8. शेष अवशेषों का उपयोग:- प्राय: इसके भूसे को जानवरों के खाने, गद्दे आदि के भरने, छप्पर तैयार करने तथा पेटियों के पैकिंग करने के काम में लिया जाता है।
  9. उत्पादन:- इसकी पैदावार 25-30 क्विटंल प्रति हैक्टर होती है। बाजार भाव अधिक होने के कारण किसान इसकी खेती से लाभान्वित होता है।
  10. बाजार भाव :- चावल के भाव गेहूं से ढाई, तीन गुणा ज्यादा होते हैं, अलग अलग किस्मों के अलग-अलग भाव होते हैं।
  11. आयात:- जब देश में सूखे की स्थिति होती है, वर्षा न होने के कारण चावल की पैदावार कम होती है। ऐसी स्थिति में चावल का आयात किया जाता है। इस समय हमारा देश आत्म निर्भर है। आयात नहीं किया जाता है।
  12. निर्यात:- भारत चावल का कई देशों में निर्यात करता है। इनमें आपसी समझौते होते हैं। इससे बहुत बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है, जो हमारे देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाती है।

चावल कहे मेरो धोलो धान रुपया पीसां का भवादूरवाल ।

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